Bastar एशिया में मिली नई पहचान : इमली से लेकर पपीता ने किया कमाल

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Bastar एशिया में मिली नई पहचान : इमली से लेकर पपीता ने किया कमाल
cg news in hindi- बस्तर (bastar news today) एक तरफ नक्सलियों के प्रभाव वाला क्षेत्र के तौर पर जाना जाता है तो वहीं दूसरी ओर बस्तर (Bastar) को अपार वन संपदा के लिये भी विश्व में जाना जाता है। आपको जान कर खुशी होगी की बस्तर में विकास और उत्पादन दोनों की गति साथ-साथ चल रही है इसी का नतीजा है कि बस्तर दो मामलो में एशिया में अग्रणी बनता नजर आ रहा है। पहली बात इमली की और फिर पपीते के उत्पादन की प्रणाली को लेकर भी चर्चा हो रही है। अब महिलाएं भी कमाई की ओर अग्रसर होती जा रही हैं।

cg news hindi- आपको बता दें कि बस्तर में इमली के कारोबार का विश्व स्तरीय कनेक्शन है। जी हां, बस्तर की इमली को विश्व भर में भेजा जाता है। इसके अलावा अब पपीता की खेती भी पनप रही है। बस्तर में जहाँ पहले बंजर भूमि थी वहॉ कुछ महिलाओं ने अपने परिश्रम से पपीता की खेती कर कारोबार बनाया। आपको बताते हैं कि कैसे इमली से लेकर पपीता तक बस्तर में बिजनेस का श्रोत बना।

500 करोड़ का कारोबार देता इमली

Bastar News in hindi - बस्तर ग्रामीणों के आय का मुख्य स्रोत भी इमली है  बस्तर के हर एक ग्रामीण अंचलों में इमली के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं  छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक इमली बस्तर में ही पाई जाती है; सालाना 500 करोड़ रुपए का कारोबार होता है. और. यही वजह है कि  और एशिया की सबसे बड़ी इमली मंडी बस्तर में ही मौजूद है। इसका एक मूल कारण यह है कि बस्तर के  ग्रामीण अंचलों में हर एक घर में इमली का पेड़ होता है।

इमली मंडी: बस्तर  एशिया में नंबर एक

एशिया की सबसे बड़ी इमली मंडी बस्तर में ही मौजूद है। बस्तर के लोग गर्मी के मौसम में  ही इमली फोड़ाई का काम करते हैं इसीलिये तो बस्तर की इमली थाईलैंड, अफगानिस्तान, श्रीलंका सहित खाड़ी के कई देशों तक हर साल सैकड़ों टन इमली विदेशों में भिजवाई जाती है।

बस्तर : बंजर जमीन से पपीता कैसे बना बिजनेस

chhattisgarh news today- एशिया में पहली बार यहां उन्नत अमीना किस्म के पपीते की खेती की जा रही।  खेती किसानी का काम करने की बात तो किसानों से ही की जा सकती है, परंतु अब बस्तर की महिलाओं को ही देख लें तो आपको एक नया अहसास होगा जिंदगी में तरक्की का नया नजरियां मिलेगा। हम बात कर रहे हैं बस्तर की 43 महिलाओं की जिन्होंने अपनी पपीता उत्पादन की सफलता से सभी को प्रभावित किया है।  महिलाओं ने एक समिति मां दन्तेश्वरी पपई उत्पादन के नाम से बनाया। बस्तर के मंगलपुर गांव में महिलाओं ने पथरीली जमीन में भी पपीते की खेती की है। मंगलपुर की ये पपीता बाड़ी नरवा गरुवा घुरूवा बाड़ी योजना की सफलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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bastar News today : माँ दन्तेश्वरी समिति की एक महिला ने अपनी बात बताते हुए कहा कि हमने 10 एकड़  में 300 टन पपीता उगाकर 40 लाख रुपये का विक्रय किया। महिला के अनुसार ये जमीन बहुत ही पथरीली और बंजर थी, जमीन को खेती लायक बनाने के लिए डेढ़ महीने तक महिलाओं ने हाथों से पत्थर बीने और तकरीबन 100 ट्राली पत्थर बाहर किये। बाहर से लाल मिट्टी लाकर जमीन को समतल किया गया।

 5 हजार से ज्यादा पपीता के पौधे

cg news today- दिल्ली में बिक रहा बस्तर की बाड़ी का पपीता यह महिलाओं की मेहनत का नतीजा है। पपीता का पौधा लगाने के लिए बेड बनाये। बड़ा बेड बनाने के लिए पुनः मिट्टी डाली गई। दिसम्बर 2021 में महिलाओं द्वारा शुरू किया गया जमीन तैयार करने का काम लगभग डेढ़ महीने चला, तब जाकर 11 जनवरी 2021 को पपीता के पौधे का रोपण शुरू हुआ। ये इन महिलाओं की कड़ी मेहनत ही है कि आज 10 एकड़ के क्षेत्र में 5500 पपीता के पौधे लहलहा रहे हैं। अभी तक 300 टन पपीते का उत्पादन हो चुका है।   

 ड्रिप इरीगेशन तकनीक क्या है -

NIBSM  के अनुसार यदि फसल की सिंचाई अच्छे से होती है, तो उसकी पैदावार भी अच्छी होती है तथा फसल भी स्वस्थ होती है | टपक (Drip) सिंचाई पद्धति एक ऐसी विधि है, जिसमे फसल को जल मंद गति से बूँद-बूँद के रूप में जड़ क्षेत्र एक छोटी व्यास की प्लास्टिक पाइप से प्रदान की जाती है | सिंचाई की इस तकनीक का इस्तेमाल सर्वप्रथम इजराइल देश में किया गया |  मंगलपुर में महिलाएं पपीता उगाने के लिए ऑटोमेटेड ड्रिप इर्रिगेशन सिस्टम से उपयुक्त मात्रा में ही पानी और घुलनशील खाद पपीता की जड़ों तक पहुंच रहा है। पथरीली जमीन में ड्रिप इरीगेशन तकनीक द्वारा ही खेती सम्भव है।  


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