Shri Vallabhacharya- वल्लभाचार्य कहाँ रहते थे? जब माता-पिता छोड़ चले गये.....

0

 
Shri Vallabhacharya, वल्लभाचार्य का इतिहास, वल्लभाचार्य जी,Vallabha Acharya,वल्लभाचार्य जीवनी वल्लभाचार्य का इतिहास, श्री वल्लभाचार्य जी,Vallabha Acharya,

vallabhacharya jayanti - छत्तीसगढ़ की धरती में अनेक महान संतों ने जन्म लिया है। यहॉ पर कबीर और गुरू घासीदास जैसे संतों ने शांति का पाठ पढ़ाया है। इसी प्रकार से संत जगतगुरू वल्लभाचार्य जी का भी जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ है। जी हां आपको इस बात की खुशी होगी की छत्तीसगढ़ में जगतगुरु वल्लभाचार्य जी का जन्म राजधानी रायपुर के पास स्थित राजिम मार्ग पर 26अप्रैल 1479 के दिन ग्राम चंपारण हुआ । आज के इस लेख में हम आपको वल्लभाचार्य जी के बारे में कुछ जानकारी देंगे जो आपके लिये रोचक होने वाली है। 

Shri Vallabhacharya- छत्तीसगढ़ पयर्टन स्थल चंपारण है वल्लभाचार्य की जन्मस्थली -
वल्लभाचार्य कहाँ रहते थे? - चंपारण में शमी वृक्ष के नीचे एक लावारिस नवजात शिशु मिला वह कोई और नहीं बल्कि आचार्य वल्लभाचार्य जी थे। जी हां दोस्तों दरअसल आचार्य वल्लभाचार्य के पिताश्री लक्ष्मण भट्ट सपत्नीक काशी यात्रा पर निकले थे तभी रास्ते में चंपारण में ही उनकी पत्नी इल्लमा गारू को प्रसव पीड़ा होने लगी।
vallabhacharya jayanti - चंपारण्य के घने जंगलों में सुनसान और अंधेरी रात में उन्होंने शमी वृक्ष के नीचे आठमासी शिशु को जन्म दिया। आचार्य वल्लभाचार्य (Vallabha Acharya) जब नवजात शिशु थे तब उनमें कोई भी हलचल नहीं हो रही थे तो यह देखकर दु:खी मन से माता-पिता ने उसे मृत समझ लिया और वहीं एक गड्ढे में सूखे पत्तों से ढककर छोड़ दिया। 

वल्लभाचार्य का इतिहास - जब माता-पिता मृत समझ, छोड़कर चले गये

दूसरे दिन सुबह उन्हें अन्य यह सुनते ही वे लोग वापस शमी वृक्ष के पास पहुंचे।तब उन्होंने देखा कि गड्ढे में पड़ा उनका बालक किलकारी भरते खेल रहा है, और उसके चारों ओर अग्नि चक्र घुम रहा है। इसे देखकर वे अचम्भित हुए और प्रभु लीला मानते हुए बालक का नामकरण वल्लभ किया।
कृष्ण भक्ति के प्रणेता के नाम से विश्व पटल पर ख्याति मिली। बृन्दावन में प्रभु वल्लभाचार्य को भगवान श्री कृष्ण ने साक्षात दर्शन देकर बाल गोपाल की पूजा करने प्रेरित किया। भारत के सांस्कृतिक -धार्मिक पटल पर आचार्य वल्लभाचार्य जी का स्थान अग्रिम पंक्ति में दर्ज हुआ।उन्हें बाल सरस्वती वाक्पति तथा जन्मोपरांत अग्नि वलय से घिरे होने की घटना के कारण वैश्वानरावतार(अग्नि अवतार) कहा गया।

जब वल्लभाचार्य ने सूरदास जी को रोते हुए मिले, बनाया प्रमुख शिष्य

वल्लभाचार्य जीवनी - महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के प्रमुख शिष्य सूरदास जी हैं,जो कि आगरा मथुरा मार्ग में यमुना नदी के तट पर उन्हें  रोते हुए मिले थे।तब वल्लभ जी उन्हें अपने साथ वृंदावन ले गए ?और श्रीनाथ के मंदिर में आरती हेतु नवपद रचने प्रेरित किया।सूरदास जी द्वारा रचित हजारों पद सूरसागर में शामिल हुए।

वल्लभाचार्य जी ने ली थी यहॉ समाधी

लगभग बावन वर्ष की आयु में आचार्य वल्लभाचार्य सदा सदा के लिए प्रभु लीला में लीन हो गए। विक्रम संवत 1583 आषाढ़ शुक्ल तृतीया को काशी के हनुमान घाट पर गंगा में उन्होंने जल समाधि ले ली। वैश्विक स्तर पर छत्तीसगढ़ की धरा को प्रसिद्धि दिलाने में महान दार्शनिक वल्लभाचार्य का पूज्य योगदान है।

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !